September 27: Day 1 of my fast, day 581 of our chain.
क्या भारतीयों में एकता कभी संभव हो सकती है?
क्या गांधी जैसा नेतृत्व दोबारा भारत को फिर कभी मिल सकता है?
शायद नहीं !
क्योंकि अब भारत में ना तो गाँधी पैदा होंगे, न नेहरू। क्योंकि अब भारतीयों के लिए देश से अधिक महत्वपूर्ण है अपनी जाति, अपना धर्म, अपनी पार्टी, अपना सम्प्रदाय और अपनी अपनी मत-मान्यताएँ।
सम्प्रदाय और जातियाँ तो पहले भी थीं, मत-मान्यता और सांस्कृतिक भिन्नता तो पहले भी थी, लेकिन उस समय फिर भी इतनी वैमनस्यता नहीं थी, कि देशभक्ति तिरोहित हो जाये।
आज तो हर कोई-कोई व्यस्त है समाज में फूट डालने में, हर कोई व्यस्त है लोगों को यह समझाने में कि देश जैसा कुछ नहीं होता, सब कुछ अमेरिका का और हम सब अमेरिका के गुलाम हैं।
इसीलिए देशभक्ति जैसी रूढ़िवादी विचारधारा का त्याग करके ग्लोबलाइज़ेशन को अपनाओ और अधीनस्थ हो जाओ शैतानी शक्तियों के।
नास्तिक लोग अपना अलग ही राग आलाप रहे हैं देश की एकता अखंडता को नष्ट करने के लिए। ये सब भी न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के लिए ही कार्य कर रहे हैं समाज में फूट डालकर।
अब ऐसी स्थिति में देश को ऐसा नेता मिलेगा कहाँ से जो सभी को जोड़ सके बिना कोई भेदभाव किए?
ऐसी स्थिति में देश में एकता और अखंडता आएगी कहाँ से जब देशभक्ति का मतलब केवल नेता और पार्टी भक्ति मात्र रह गयी हो ?
~ विशुद्ध चैतन्य
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September 28: Day 2 of my fast, day 582 of our chain.
मोदी सरकार राजस्व में कमी की भरपाई के लिए चालू वित्त वर्ष 2021-22 की दूसरी छमाही में 5.03 लाख करोड़ रुपये का कर्ज ले रही है जी हाँ आपने ठीक पढ़ा पाँच लाख करोड़ का कर्ज
यह लोग कहते हैं कि नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन से छह लाख करोड़ आएंगे सवाल यह है कि वह छह लाख करोड़ कब तक चलेंगे
जो राजकोषीय घाटा 2019-20 में जीडीपी का 4.6 प्रतिशत रहा था वही घाटा वित्त वर्ष 2020-21 में 9.3 प्रतिशत हो गया जबकि 2020-21 के बजट में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 3.5 फीसदी रहने का अनुमान रखा गया था
कहा जा रहा है कि मुख्य रूप से राजस्व कम होने से राजकोषीय घाटा बढ़ा है।
यदि आपकी GST व्यवस्था इतनी ही अच्छी थी, हर महीने एक लाख करोड़ की एंट्री हो रही है तो राजस्व में कमी क्यो दर्ज की जा रही है?
जबकि आपके खर्चे कम हुए हैं 2021-22 के पहले 4 महीनों में पेट्रोलियम प्रोडक्ट सब्सिडी मात्र 1,233 करोड़ रुपए पर रहने का अनुमान किया गया था। जबकि पिछले साल 2020-21 की इसी अवधि के 16,461 करोड़ रुपए सब्सिडी में खर्च किये गए थे
पेट्रोलियम प्रोडक्ट पर एक्साइज ड्यूटी से हर साल केंद्र सरकार रिकॉर्ड तोड़ कमाई कर रही है यानी वहाँ भी आमदनी बढ़ रही है, सरकारी नोकरी से रोजगार दिए नही जा रहे हैं, तो वहाँ भी बचत है अफसर रिटायर हो रहे हैं नयी नियुक्ति की नही जा रही है फिर आखिर पैसा जा कहा रहा है जो पाँच लाख करोड़ का कर्ज आगामी छह महीनों के लिए लिया जा रहा है ?
Girish Malviya
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September 29: Day 3 of my fast, day 583 of our chain.
मनीष गुप्ता एक व्यापारी थे , गोरखपुर किसी काम के सिलसिले में आए थे । होटल में रुके हुए थे । होटल में पुलिस वाले आए , मनीष गुप्ता को पकड़कर इतना पीटा कि उनकी मृत्यु हो गयी ।
मनीष गुप्ता पर लव जिहाद , धर्मांतरण या आतंकवादी जैसे चार्ज भी नहीं लग सकते , अब देखते है कि प्रदेश की पुलिस या सरकार इस मामले में क्या सफ़ाई देती है ।
मनीष अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़कर गए हैं । उनकी पत्नी और उनके बेटे से मुझे पूरी हमदर्दी है । आप लोग इतना याद रखिए कि मीडिया और विशेष संगठन के लोगों ने जो देश और ख़ासतौर से उत्तर प्रदेश का माहौल बनाया है , उसका शिकार कोई भी हो सकता है । आज मनीष गुप्ता इस निरंकुशता की ज़द में आए हैं , कल को आपका भी नम्बर लग सकता है ।
अगर उत्तर प्रदेश में हो , तो सावधान और सतर्क रहो ।
इब्न ए आदम
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September 30: Day 4 of my fast, day 584 of our chain.
पीएम केयर्स की इस साल ऑडिट रिपोर्ट नहीं आई है। सवाल उठ रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
अब एक सनसनीखेज़ खबर यह निकलकर आई है कि मोदी सरकार ने पीएम राष्ट्रीय आपदा राहत कोष का दुरुपयोग किया।
यह खुद राहत कोष का स्टेटमेंट कह रहा है। 2019-20 के इस स्टेटमेंट में साफ़ है कि मोदी सरकार ने राहत कोष से 250 करोड़ की एफडी खस्ताहाल यस बैंक में करवाई।
वह भी तब, जबकि RBI ने 2018 में ही बता दिया था कि यस बैंक की माली हालत खस्ता है।
RBI ने 2019 की शुरुआत में यस बैंक पर पाबंदी लगाई थी। खुद वित्त मंत्री बता चुकी हैं कि RBI की बैंक पर नज़र 2017 से ही थी।
फिर सरकार ने एफडी क्यों करवाई? कहीं यह एक निजी बैंक के बेलआउट की कोशिश तो नहीं थी?
बिल्कुल। और इस कोशिश के लिए बैंक की ओर से दलाली भी मिली होगी!
लेकिन किसको? किस चैनल के ज़रिए?
सवाल और भी हैं और उनके जवाब भी।
लेकिन इसकी एक बानगी यह है कि कल शाम को 2022 के चुनावों के लिए इलेक्टोरल बांड्स के दरवाजे फिर खोले गए हैं। (PIB का बयान नीचे है)
इलेक्टोरल बांड RTI के दायरे में नहीं आता। पीएम केयर्स भी नहीं।
ठीक इसी तरह 250 करोड़ की एफडी के पीछे की दलाली का राज़ भी शायद ही कभी खुले।
न खाऊंगा, न खाने दूंगा की सरकार में काला धन धड़ल्ले से पैदा हो रहा है। must check comment box
Soumitra Roy Sir.
#ChainFastingForPeace #FastingAgainstFascism #FreeSanjivBhatt #ResignAmitShah #ResignModi
October 1: Day 5 of my fast, day 585 of our chain.
नीचे लगी अखबार की कतरन अगर आपको बेचैन नहीं कर रही है, तो यकीनन आप मूर्ख हैं या आपकी संवेदनशीलता मर चुकी है।
पेडिग्री मीडिया ने आज यह खबर दबा दी। कल स्पेशल कोर्ट ने जब रेवेन्यू इंटेलिजेंस निदेशालय (DRI) के अफसरों से गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर उतरे 21000 करोड़ के ड्रग के मामले में डिटेल मांगी, तो जवाब क्या मिला पढ़िए।
अडाणी समूह ने DRI के अफसरों से कह दिया कि वे लीगल परामर्श लिए बिना कोई जानकारी नहीं देंगे।
कोर्ट ने पूछा- क्या वे कानून से परे हैं।
बस, इसी सवाल पर आकर समूचा सिस्टम प्राइवेट के आगे दंडवत हो जाता है।
सड़क से लेकर बिजली, शिक्षा, पानी, स्वास्थ्य- सभी में भागीदार निजी कंपनियां (अडाणी तो लाड़ला है) सरकार को ज़िम्मेदारी और जवाबदेही के मामले में ठेंगा दिखा देती हैं।
भारत में इस निजीकरण की शुरुआत 1991 में नरसिंहराव सरकार के समय से हुई, जो अब बेचने के कगार पर आ चुकी है।
भारत में सीमित निजीकरण होना चाहिए था, लेकिन हमारे मूर्ख समाज ने ख़ुद आगे बढ़कर अपने संसाधनों को निजी कंपनियों के हवाले करना शुरू किया।
आज नौबत यह है कि देश की लोकतांत्रिक सरकार ही इन कंपनियों से चुनावी चंदा और ऊंची ब्याज़ दरों पर कर्ज़ ले रही है।
सरकार अब दीनदयाल है और अडाणी जैसी कंपनियां साहूकार, जो जब चाहे घर में घुसकर सामान तो क्या, बहू-बेटियां भी उठा ले जाये।
यह नरेंद्र मोदी का सिस्टम है और इसी सिस्टम में कार्यपालिका के संचालन का समूचा तंत्र दिन-ब-दिन घुलता जा रहा है।
देश का धर्मांध, मूर्ख समाज- जिसे हज़ारों साल से वैचारिक ग़ुलामी पसंद है, चुपचाप तमाशा देख रहा है।
आप अडाणी को क्यों कोसते हैं? आपने ही तो अपने टैक्स के पैसे से खड़ी की गई संपत्तियों को अडाणी के हवाले किये जाने से नहीं रोका।
आपने ही तो अपने बच्चों को सरकारी के बजाय शिक्षा माफ़िया के हवाले किया।
आपने ही तो सड़क, बिजली, पानी की सुविधा के लिए PPP पर हामी भरी थी। भूल गए?
आपने यह सब क्यों किया?
क्योंकि इन सुविधाओं की बहाली को लेकर सरकार पर आपका भरोसा नहीं था। आपको लगता था कि प्राइवेट कंपनियां ज़्यादा पैसे लेकर बेहतर सेवा देंगी।
क्या ऐसा हुआ?
अगर हुआ भी, तो क्या कंपनियों के एकाधिकार ने देश के संविधान को बौना नहीं किया? क्या आपने बजाय प्राइवेट कंपनियों पर दांव लगाने के सरकार को ज़िम्मेदार और जवाबदेह बनाया?
नहीं। आप सिर्फ वोट डालते गए। सरकार बनवाई, पर अपना हक नहीं मांगा, क्योंकि आप जन्मों से ग़ुलाम हैं।
हम न तो सरकार से लड़ सकते हैं और न इन कंपनियों की मनमानी से।
क्योंकि हम हर इंसान को जात, मज़हब, नस्ल जैसे मापकों से देखते हैं। इसीलिए हम खुद बंटे हुए हैं।
हम एक राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं में कैद होते हुए भी इन दकियानूसी सामाजिक मापकों में बंटे हुए हैं, जो गोरखपुर के व्यापारी की हत्या को हिन्दू-मुस्लिम रंग में देखता है, इंसान के रूप में नहीं।
यहीं आप उस संविधान का मखौल उड़ाते हैं, जो समानता की बात करता है।
दरअसल, आपको भेड़ के रूप में हांका जाना ज़्यादा सुहाता है, क्योंकि ये सरल है।
एक दिन अडाणी की पुलिस होगी, उसकी अदालत और उसी का संविधान होगा। अग्निपथ फ़िल्म के मांडवा गांव की तरह।
वही इस अभागे देश के लिए अच्छे दिन होंगे और आप कहीं अधनंगे, नशे में पड़े होंगे।
Soumitra Roy Sir
#ChainFastingForPeace #FastingAgainstFascism #FreeSanjivBhatt #ResignAmitShah #ResignModi










