Nov 10: Day 1 of my fast, day 988 of our chain.
#amazonprime पर एक डॉक्यूमेंटरी वेब सिरीज़ देखी थी, जिसमें सिंगापूर गयी भारतीय सेना को यह एहसास तक नहीं था कि वे गुलाम देश के सैनिक हैं। उन्हें पता ही नहीं था कि ब्रिटिश भारत पर कब्जा जमाये बैठे हैं, न कि वे भारतीय हैं।
वे तो इसी भ्रम में जी रहे थे कि वे भारतीय सेना की शान हैं, भारत की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुती देने निकले हैं। लेकिन जब सुभाषचंद्र बोस ने विदेशी भूमि से भारत स्वतन्त्रता अभियान छेड़ा, तब सिंगापूर निवासी माया नाम की एक फोटो पत्रकार भी सुभाषचंद्र बोस के स्वतन्त्रता अभियान का हिस्सा बन गयी। और जब माया की भेंट भारतीय सेना के कप्तान यानि फिल्म के हीरो से हुई, तब पहली बार कप्तान को पता चला कि वह गुलाम देश का गुलाम सिपाही है।
जब माया ने उसे समझाया कि सुभाषचंद्र बोस की सेना भारतीय है, न कि जिनके अधीन तुम काम कर रहे हो, वह भारतीय है, तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ। उसका कहना था कि मेरे दादा-पड़दादा सभी गोरों के सिपाही रहे हैं, तो फिर गोरे विदेशी कैसे हो गए ? क्या तुम रंगभेद के आधार पर उन्हें विदेशी बता रही हो ?
वह मानने को तैयार ही नहीं था कि वह देश की नहीं, विदेशियों की सेवा कर रहा है और विदेशियों के लिए ही अपने प्राणो की आहुति दे रहा है।
उसे समझ में तब आयी, जब जापानी सेना को घुटनो पर ला देने के बाद भी ब्रिटिश सरकार ने उनसे कहा कि हथियार उन्हें सौंप दो और आत्मसमर्पण कर दो। यानि जीती हुई बाजी जानबूझकर हार जाओ और अपने आप को दुश्मनों के हवाले कर दो।
इस अपमान ने उसकी आँखें खोल दी और वह आजाद हिन्द फौज में शामिल होकर नए शामिल हुए देशभक्तों को सेना की ट्रेनिंग देने लगा।
क्या आज भी कुछ बदला है ?
नहीं आज भी कुछ नहीं बदला और आज भी हम विदेशियों के ही गुलाम हैं। ना तो हमारे पास अपनी कोई राजनैतिक पार्टी है, न ही अपनी कोई सरकार। जो भी यहाँ देशभक्ति की पीपणी बजाते घूम रहे नेता दिख रहे हैं, सभी विदेशियों के ही पपेट हैं। राजनैतिक पार्टियां भी विदेशियों की ही गुलाम हैं। जैसा वे लोग कहेंगे, वैसा ही ये सब करेंगे, भले इन्हें अपने ही देश की जनता को मौत के मुँह पर धकेलना पड़े, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। बात बिगड़ती दिखी, तो भाग कर अपने आकाओं के पास विदेश पहुँच जाएंगे माल्या, नीरव, चौकसी की तरह।
यदि प्रायोजित महामारी के नाम पर झूठ फैलाकर पूरी दुनिया को बंधक न बनाया गया होता, यदि दुनिया की सभी मीडिया को गुलाम बनाकर जनता को मूर्ख बनाने का प्रयास न किया गया होता, तो शायद दुनिया यह कभी नहीं जान पाती कि उनकी अपनी सरकार ही उनकी अपनी नहीं है। सभी उनकी गुलाम हैं, जो दुनिया की सभी बैंकों का मालिक है। और वह मालिक पूरे विश्व को अपना गुलाम बनाना चाहता है।
लेकिन देश की सरकारें झूठी देशभक्ति का ढोंग करके सेना, पुलिस और पूरी जनता को मूर्ख बनाती रहती है। एक एक करके सारा देश नीलाम हुआ चला जा रहा है न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के नाम पर, और जनता भक्ति के नशे में धुत्त बेहोश पड़ी हुई है।
Nov 11: Day 2 of my fast, day 988 of our chain.
रोमन एम्पायर..
ईसा के 500 साल पहले शुरू हुआ। और पूर्वी रोमन एम्पायर को जोड़ दिया जाए, तो ईसा के बाद 15 वीं शताब्दी में अंत हुआ।
2000 साल ! टिका रहा..
सुदूर इलाकों तक। जहां से आने जाने में बरसों लग जाते। उन जगहों रोमन साम्राज्य टिका रहा। कारण??
एप्रोप्रियेशन!!
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घुल जाना, मिल जाना, मिला लेना।
सुदूर इलाके जीते जाते। गैर रोमन भाषा, कल्चर के कबीले वालों के ऊपर सेना, पैसे या फूट डालकर इलाके पर सत्ता तो कायम हो जाती।
लेकिन फिर वहां जड़े गहरी बनाई जाती।
उस इलाके में लोकल कस्टम, रूल्स, धर्म, रवायतों, खानपान से छेड़छाड़ नही होती। बल्कि उनके इलाके का रूलर भी उनका अपना आदमी ही रखा जाता। उनकी भाषा बोलने वाला, उनके रंग वाला, उनके धर्म वाला।
इसकी एक शानदार व्यवस्था थी।
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ट्राइबल, बर्बर इलाको के कबीलाई चीफ के बच्चो को सुरक्षा का भरोसा देकर रोम लाया जाता। उन्हें प्राचीन रोम शहर के सबसे बेहतरीन संस्थानो में शिक्षा दी जाती।
युद्ध नीति, दर्शन, कानून, रोमन सभ्यता, विचार की सबसे बेहतरीन शिक्षा। पांच सात साल की उम्र के बच्चे, युवा होकर रोमन सेना के वारियर बनते। और फ़िर, उनमे से बेस्ट, वफादार लोग, विजित सूबों में प्रशासक बनाकर भेजे जाते।
एप्रोप्रियेशन।
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राज्यपाल की तरह एक रोमन फ़िगरहेड होता, लेकिन उसी स्थान के रोमनाइज हो चुके लोग, उसकी सत्ता के पाए होते। ट्राइबल चीफ्स अपने बच्चो को रोमन सत्ता का हिस्सा बनाकर खुश होते।
रोमन ड्रेस, रोमन भाषा, रोमन औरा में अपने बच्चे को देखना उनके लिए गर्व की बात होती। आर्मीनियस ( ऑफ जर्मनी, सर्च कीजिए) के विद्रोह जैसे अपवाद को छोड़ दें, तो ये व्यवस्था रोमन राज के स्थायित्व का आधार थी।
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ठीक यही व्यवस्था ऑटोमन्स ने अपनायी। सेंट्रल यूरोप से ईसाई, सर्ब, क्रोट्स, और तमाम आदिम जातियों के परिवार से बच्चे, मांगकर लेते। इस्तांबुल लाते, औऱ बेहतरीन शिक्षा देते।
इस्लाम मे ढाला जाता। राजा के प्रति शपथ दिलाकर, इन्हें जाँनिसारी टुकड़ी में भरती किया जाता। ऑटोमन्स की ये सबसे एलीट टुकड़ी थी। इसी से सेनानायक, पॉलिटिशियन और गवर्नर निकलते। हाल ये था कि लोग इसमे अपने बच्चे देने के लिए रिश्वत देते।
ऑटोमन्स का साम्राज्य 500 साल चला। कारण- एप्रोप्रियेशन!!!
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अंग्रेजो ने आईसीएस बनाई। भारत मे भूरे साहब खड़े किए। ब्रिटिश के लिए ब्रिटिश से ज्यादा लॉयल सैनिक और प्रशासनिक अफसर बनाये। लोकल राजाओ को अधिकार दिये, इज्जत, पदवी, दरबार मे ऊंचा आसन दिया। नतीजा- 200 साल, बेखटके राज किया।
वेदों में गेरुए वस्त्र का विवरण नही। देवी देवताओं का पूजन लाल वस्त्र या श्वेत वस्त्र में होता है। बुद्ध का चीवर जरूर गेरुआ था। आंखों को चुभने वाला रंग, जो दूर से दिखे, कि देखो भिक्खु आ रहा है।
ये रंग चालाकी से हिंदुत्व का वस्त्र हो गया। अनार्यों के देव शिव, आर्यों के ग्रन्थों में ब्रह्मा और विष्णु के साथ बिठाकर त्रिदेव बना दिये गए। कांग्रेसियों के सुभाष, सरदार संघी फोक का हिस्सा बन रहे हैं।
इट इज, माई फ्रेंड, एप्रोप्रियेशन !!!
सत्ता के लिए, स्वीकार्यता के लिए, मान्यता और स्थिरता के लिए इतिहास में सबसे पॉवरफुल टूल रहा है। ईस्टर्न रोमन एंपायर तो इसलिए और लम्बा जिया, क्योकि राजा कॉन्सटेंटाइन ने पब्लिक का धर्म, याने क्रिस्चियनिटी को अपना लिया।
बिल्कुल वही धर्म, जिसके प्रणेता को खुद रोमनों ने सूली पर चढ़ाया था।
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रिवर्स में आइये। उच्चता के घमण्ड, और एप्रोप्रियेशन के अभाव में, नाजी जर्मनी 12 साल में मिट गया। नेपोलियन का साम्राज्य महज 10 साल में खत्म हो गया, कारण- नेपोलियनिक कोड का जबरन पालन कराना..
घुलने मिलने, एप्रोप्रियेशन के अभाव में दिल्ली सल्तनत का कोई भी वंश ( गुलाम, खिलजी, लोदी, तुगलक) 100-50 साल से ज्यादा न चला। अंग्रेज भी लिमिट में ही जोड़ पाए, तो 200 साल का राज पाया।
लेकिन मुगल 400 साल निकाल गए।
एक भाषा, एक रंग, एक धर्म, एक वस्त्र, एक बाजार, एक टैक्स, एक नेता, एक भगवान.. अस्थिरता का, अस्वीकार्यता का, रेबेलियन का मूल है। रेजीम की मूर्खता है।
और गहराई से समझें, तो जिसे सहिष्णुता, बहुरंगता, समरसता, प्रेमभाव वगैरह के नामों से ग्लैमराइज किया जाता है, असल मे एप्रोप्रियेशन की ठंडी, चालाकी भरी पॉलिसी है।
होशियारी है, स्मार्टनेस है। जो रेजीम को स्थिरता देती है। राष्ट्र की उम्र बढाती है।
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75 साल का यह राष्ट्र, कितना रोमनों की तरह व्यवहार करता है, और कितना नाजियों की तरह.. इसकी उम्र इसी से निर्धारित होगी।
क्योकि अजर अमर कुछ नही होता। राजा नही, पार्टी नही, विचारधारा नही,
और इतिहास बताता है..
कि कोई देश भी नही।
Manish Singh Reborn Sir


Nov 12:
Post 1: Day 3 of my fast, day 990 of our chain.
एक कहानी
एक बुढ़िया ने घर की हाथ की आटा चक्की खुटवाने वाले कारीगर को बुलाया।
देख भाई चक्की खोटना जानता तो है ना?…ये पड़ी है चक्की इसे ठीक कर दे, बस आज लायक दलिया बचा है, वो चूल्हे पर चढ़ा दिया है, तू चक्की ठीक कर, मैं तब तक कुएँ से मटकी भर लाती हूँ।
ठीक है अम्मा चिंता मत कर मेरी कारीगरी के तो 7 गाँवों में चर्चे हैं, चक्की ऐसी खोटूंगा की आटा पीसेगी और मैदा निकलगी। चूल्हे पर चढ़ा तेरा दलिया भी सम्भाल लूंगा।
बुढ़िया आश्वस्त हो कर कुंए को निकल ली और कारीगर चक्की की खुटाई करने लगा।
हत्थे से निकल कर हथौड़ी उछल कर चूल्हे के ऊपर लटकी घी की बिलोनी पर लगी, घी सहित बिलोनी चूल्हे पर चढ़ी दलिये की हांडी पर गिर पड़ी।
कारीगर हड़बड़ा गया और हड़बड़ाहट में चक्की का पाट भी टूट गया। कुछ समझ में आता, उससे पहले चूल्हे पर बिखर गए घी से लपटें उछल कर उठी तो फूस की छान/छत ने आग पकड़ ली और झोंपड़ी धूं-धूं जलने लगी।
कारीगर अपना झोला लेकर उलटे पाँव भागा और रास्ते में आती बुढ़िया से टकरा गया, जिससे उसकी मटकी भी गिर गयी और फूट गई।
अरे रोऊँ तुझे, ऐसी क्या जल्दी थी? अब रात को क्या प्यासी सोऊंगी, एक ही मटकी थी, वो भी तूने फोड़ दी।
कारीगर बोला अम्मा किस- किस को रोयेगी। पानी की मटकी को रोयेगी, घी की बिलोनी को रोयेगी, दलिये की हांड़ी को रोयेगी, टूटी चक्की को रोयेगी या जल गई अपनी झोंपड़ी को रोयेगी और कारीगर झोला उठा कर भाग छूटा।
इस कहानी का राजनीति व किसी नेता से कोई संबंध नहीं है लेकिन कुछ देशद्रोही इस कहानी को राजनीति से जोड़ देंगे और कहेंगे:
देश भी कुछ ऐसे ही हाथों में पड़ा है । GDP को रोओगे, कोरोना को रोओगे, बेरोजगारी को रोओगे, मंहगाई को रोओगे या बर्बाद/बिक चुकी संस्थाओं/ संसाधनों को रोओगे, फैली अराजकता को रोओगे? किस-किस को रोओगे ??? आंसू कम पड़ जाएंगे..!![]()
Post 2: Day 3 of my fast, day 990 of our chain.
एक व्यक्ति ओशो के पास गया और बोला कि मैं देश की दुर्दशा देखकर बहुत दुखी हूं। समझ में नहीं आ रहा कि कैसे देश की दशा सुधारूं ?
ओशो ने कहा कि देश की दशा बाद में सुधार लेना, पहले अपनी दशा सुधार लो। तुम्हारी दशा सुधर गई तो देश की दशा अपने आप सुधर जाएगी।
तब मुझे लगा था कि ओशो गलत है और व्यक्ति की देशभक्ति की भावना को मोड़कर स्वार्थी बना रहा है।
लेकिन आज मैं जानता हूं कि ओशो ने गलत नहीं कहा था। होता बिलकुल यही कि अपनी दशा सुधर जाए तो देश की दशा सुधर जाती है।
उदाहरण के लिए कोई बेरोजगार है और सरकारी नौकरी के लिए धक्के खा रहा है। उसे हर तरफ महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी, शोषण और अत्याचार नजर आ रहा है। फिर एक दिन उसकी सरकारी नौकरी लग जाती है। सारा घर खुशी से झूम उठता है। और फिर आजीवन उसे बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, शोषण, अत्याचार और भ्रष्टाचार नजर नहीं आता।
दूसरा उदाहरण: एक बेरोजगार युवक समाज सेवक बन गया। आदिवासियों, गरीबों, किसानों के हितों के लिए आवाज उठाता है, पुलिस की लाठियां खाता है। फिर एक दिन किसी मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पैकेज पर नौकरी लग गई। अब उसे पूरा देश सुखी, समृद्ध, विकसित नजर आने लगेगा। कुछ समय बाद विदेश में सेटल हो जाएगा और शान का जीवन जीएगा।
इसीलिए विद्वानों ने कहा है: स्वयं को बदलो, दुनिया अपने आप बदल जाएगी। केवल नजरिए का ही फर्क होता है। नजरिया बदल लो और सबकुछ बदल जाता है। और शायद इसी को माया कहा गया है।
दुनिया में कोई दुख नहीं है। कहीं बेरोजगारी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, शोषण और अत्याचार नहीं है। केवल हम दुखी हैं,। इसीलिए चारों तरफ दुख नजर आ रहा है। हम सुखी हो जाएं, तो चारों ओर सुख ही सुख नजर आएगा।
