July 13: Day 1 of my fast, day 868 of our chain.
गुजरात की बाढ़ में बदहाल सड़कों, गड्ढे, मेनहोल, सीवर और लबालब सड़कों पर रेंगती जिंदगियों की तस्वीरें हर साल की तरह विकास और सिस्टम का सच दिखाती हैं।
लेकिन आप या 7 करोड़ गुजराती (जिन्होंने बारिश को इंच में नापना सिखाया) इससे सीखते क्या हैं?
कुछ नहीं। बाढ़ का पानी एक दिन उतरेगा। जिंदगी फिर दौड़ने लगेगी। सब एक्ट ऑफ गॉड मानकर फिर हिन्दू राष्ट्र बनाने में जुट जाएंगे।
लेकिन दरअसल, यह एक्ट ऑफ पॉलिटिक्स है। बहुत गंदी राजनीति। इसे ऐसे समझें-
मोदी सरकार इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर इतना ज़ोर क्यों देती है- जिसका रोज़गार, रोटी, कपड़ा, मकान से कोई लेना-देना नहीं? देवघर में एयरपोर्ट खुल गया। फटेहाल बच्चे हवाई जहाज उड़ते देखकर खुश होंगे। फिर अदाणी को एयरपोर्ट बिक जाएगा।
पूरा खेल चुनावी चंदे का है। चुनावी राज्यों में अरबों की परियोजनाओं का ऐलान चंदे का टारगेट फ़िक्स करता है। गुजरात मे टारगेट फ़िक्स हो चुका है।
कौन ठेका लेगा, कितना माल आएगा, कितने परसेंट की दलाली होगी- सब-कुछ।
शहरों के लिए भी योजनाओं में ठेकेदारों से चंदे की डील पार्टी फण्ड के लिए पहले से तय हो जाती है। अफसरों, बाबुओं तक का टारगेट फिक्स रहता है।
अब 20% पार्टी फण्ड और बचे पैसे में 30% सिस्टम को खिलाकर सड़क गड्ढेदार ही बनेगी। कॉलोनाइजर, बिल्डर सब पार्टी फण्ड में पैसा देते हैं, ताकि उनके प्रोजेक्ट्स नाले के ऊपर बन सकें।
बाकी, रोज़ 1000 रुपये कमाने वाले खोमचे वालों से भी वार्ड स्तर पर वसूली होती है, जो दशहरा-दिवाली पर नज़र आएगी।
मोदीराज में बीजेपी का झंडा इसी सिस्टम से बुलंद है। विकास एक जुमला है। इस जुमले के पीछे के खेल को समझें।
मुमकिन है थोड़े से छींटे शायद आपको अपने दामन पर भी नज़र आएं।
इसीलिए, 95% पोस्ट अधूरा सच होती हैं। गोदी मीडिया की तरह।✍️ Soumitra Roy Sir
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July 14: Day 2 of my fast, day 869 of our chain.
Himanshu Kumar जी पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगा। 13 साल से न्याय की आस में एक गांधीवादी व्यक्ति, जूझता रहा। उसने सुख-सुविधा की जिंदगी न जी। अपने लिए कोई कोठा-अटारी नहीं। बैंक लुटेरे विजयमाल्या की तरह लंदन में फ्लैट नहीं। 2009 में, सुकमा ज़िले के गोमपाड़ में 16 आदिवासियों को तथाकथित फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने और एक मासूम बच्चे का हाथ काटने के मामले में न्याय के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब जो न्याय मिला है, क्या वही प्रेयर में था? केस खारिज तो हुआ ही, उल्टे चार हफ्ते में 5 लाख देने और छत्तीसगढ़ सरकार को धारा 211 के तहत उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का निर्देश मिला। यही न्याय हुआ है। हिमांशु कुमार अपने लिए क्या मांग रहे थे? वे जवानी में आदिवासियों की भलाई के लिए बस्तर आये और वहीं बस गए। वनवासी चेतना आश्रम बनाकर आदिवासियों के बीच काम करने लगे। यही चेतना निर्माण तो घातक हुई? ठीक सुधा भारद्वाज और फादर स्टेंन स्वामी की तरह आदिवासियों के पक्ष में खड़ा होना अपराध बन गया। हिमांशु कुमार तो पुरस्कार योग्य थे मगर भगोड़े और लुटेरे विजयमाल्या पर दो हजार जुर्माना जहां लगा, वहीं गांधीवादी पर 5 लाख?
जनता के साथ जुड़े लोगों पर यह कहर है।
आइए, हिमांशु कुमार के साथ खड़े होइए। आदिवासियों पर उपन्यास लिखने से ज्यादा यह जरूरी है। हिमांशु कुमार का इंटरव्यू देखें। ,(1)https://www.youtube.com/watch?v=00HDCfd9Q6g हिमांशु कुमार से वर्कर यूनिट ने की बातचीत (2)https://www.youtube.com/watch?v=sgq7zcmqKuc
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June 15: Day 3 of my fast, day 870 of our chain.
यह मेधा पाटेकर हैं। अपने ऑफिस में अपने बिस्तर पर बैठी दाल-रोटी खा रही हैं। यह कमरा उनके सोने का भी कमरा है, उनके पढ़ने का भी और उनका ऑफिस भी। उनका बिस्तर है- जमीन पर एक चटाई, एक तकिया, एक चादर। बाकी कमरा कागजात और किताबों से भरा।
5 साल पहले मैं उनके ऑफिस गया था। कोई 5 या 6 दिन यहां रहा था। उनके दफ्तर का खाना उतना ही साधारण होता है जैसे किसी आदिवासी के घर का खाना। उबली हुई पतली दाल बिना छौंक वाली और बड़ी-बड़ी मोटी चपाती।
यह तस्वीर उनके बड़वानी स्थित ऑफिस की है। मेधा जी एक सूती धोती, गले में एक डोरी से लटका चश्मा और हवाई चप्पल पहने आदिवासी इलाकों से लेकर दिल्ली तक खाक छानती रहती हैं।
जब मैं इनके पास गया था, उस वक्त सरदार सरोवर बांध के विस्थापितों का मुद्दा जोर पकड़ा हुआ था क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांध का उद्घाटन कर दिया था और विस्थापितों को अभी तक मुआवजा नहीं मिला था।
हर दिन इस दफ्तर में दर्जनों या सैकड़ों लोग आते थे। ये वो लोग थे जिनकी जमीन-खेत या घर-बार सब कुछ बांध क्षेत्र में चला गया था और उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला था। मेधा पाटेकर का काम था हर दिन अलग-अलग दफ्तरों में इन लोगों की याचिकाओं को पहुंचाना और उनके लिए उचित मुआवजा मांगना।
किसी समाज का पतन कैसे होता है यह देखने के लिए मेधा पाटेकर का उदाहरण सबसे मुफीद है। देश की सबसे गरीब और लाचार जनता की पूरे जीवन सेवा करने के बाद वे चुनाव लड़ीं तो जनता ने उनका साथ नहीं दिया। अब बाकी समाजसेवियों की तरह उन्हें भी प्रताड़ित किया जा रहा है।
मेधा जी और उनके एनजीओ पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने 13 करोड़ का गबन किया है। इसे लेकर उनके खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज किया गया है। मेधा पाटेकर ने अपनी पूरी जिंदगी पीड़ित लोगों को न्याय दिलाने में लगा दी। सरदार सरोवर बांध के विस्थापितों को न्याय दिलाने के लिए मेधा पाटेकर एकमात्र आवाज रहीं। उन्होंने सैकड़ों आदिवासियों गरीबों और और कमजोर लोगों को उचित मुआवजा भी दिलवाया लेकिन आज उन्हें भ्रष्ट बताकर उन्हें जेल में डालने की कवायद चल रही है।
तीस्ता सीतलवाड़ गुजरात के पीड़ितों की आवाज़ उठाने के लिए जेल में हैं। सुप्रीम कोर्ट में आदिवासियों के नरसंहार की जांच की मांग करने वाले हिमांशु कुमार पर कल कोर्ट ने 5 लाख का जुर्माना लगा दिया है। फेक न्यूज का भंडाफोड़ करने वाले जुबेर जेल में हैं।
अपनी युवावस्था में हमारे लिए जितने लोग समाज के आदर्श थे, आज वे सब अपराधी हैं और समाज में जहर घोलने वाले निष्कंटक राज कर रहे हैं। जो जितना बड़ा जहरीला, उसको उतना बड़ा पद।
यह न्यू इंडिया का अमृतकाल है। इसे समाजसेवी और बुद्धिजीवी नहीं चाहिए। इसे दंगाई, लुटेरे और डकैत चाहिए। आपको अमृतकाल की बधाई। ✍️ Krishna Kant Sir
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